कहासुनी में आज : जातिवाद दलितवाद राजनीति और हंगामा….????

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आज जहां डिजिटल इंडिया की बात हो रही है वहां जातिवाद और दलितवाद की बात करना हास्य से कम नहीं है। जहां देश बड़े बड़े मुकाम हासिल कर रही है वहां जातिवाद और दलितवाद किसी कोढ़ से कम नहीं।

हाल ही में घटित महाराष्ट्र की दलितवादी घटना कहीं ना कहीं भारत की खोखली तस्वीर उजागर करती है। छोटी सी विवाद से उत्पन्न घटना इतना विकराल रूप ले लेगी कि देश के लाखों का नुकसान उठाना पड़ा यह काफी दयनीय और चिंताजनक है। हमने हजारों युवाओं को सड़क पर नारेबाजी पत्थरबाजी और आक्रमक रूप में देखा लोग मरने मारने पर उतारू हुए। क्या अंबेडकर जी ने इसी भारत के सपने देखे होंगे ?




दलित कोई मुद्दा नहीं उनको शिक्षा और जागरूकता की जरूरत है दलित होकर जहां अंबेडकर जी भारत को संविधान दे गए। वहां इन दलित वर्गों को मूर्खतापूर्ण हरकत उनकी आत्मा को चोट पहुंचाने जैसा लगता है। और इन सब का फायदा उठाती हमारी राजनीतिक दलों शुरुवात से जातिवाद दलितवाद के साथ राजनीति का गंदा खेल खेलती रही है। राजनीतिक दलों के नेता तोड़-जोड़ के चक्कर मे कभी-कभी देश को तोड़ने का काम कर जाते हैं। इस मुद्दे पर कुछ दल के नेताओं ने आग में घी डालने का काम किया। मामला शांत करने के बजाय राजनीति करने बैठ गए।

कहां जा रहा है हमारा देश ?
क्या हमें गंभीर मुद्दों पर खुद विचार रखने नहीं चाहिए ? कैसे हम भी बेमतलब के मुद्दों का हिस्सा बन बैठते हैं और यह विकराल रुप ले लेता हैं ? कहीं ना कहीं हमारी मानसिकता में कमी है ?

हर ओर मची लूट में कोई विकास की बात करें तो कैसे करें ? बेहतर होगा हम अपनी सोच-समझ को विकसित करें और इस व्यर्थ के मुद्दों का हिस्सा ना बने…..

—-सरिता पटेल

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